संसद ठप हो जाती है पर सांसदों के ठप्पे कम नहीं होते

‘’’’’’’’’गरीब और किसान वर्ग पर इसका सीधा प्रभाव’’’’’’’’’’’’

Manish bafana -भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच, संसद का मानसून सत्र (20 जुलाई से 13 अगस्त

2026) भारी राजनीतिक हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ गया. विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के

बीच टकराव के कारण दोनों सदनों की उत्पादकता (Productivity) अपने सबसे निचले स्तर पर रही.

लोकसभा मात्र 19% और राज्यसभा केवल 39% ही काम कर सकी. इस गतिरोध ने न केवल देश की

वित्तीय स्थिति को चोट पहुँचाई है, बल्कि इसका सबसे गहरा और सीधा प्रभाव देश के गरीब, मजदूर और

किसान वर्ग पर पड़ा है।

संसद को लोकतंत्र का मंदिर बोला जाता है जहां जनता के सपने पूरे होते हैं ! संसद से ही जनता की मुंह की मुरादे पूरी होती है!

संसद एक मंदिर होता है जहां पर घंटी की गूंज और पूजा की आरती से लोकतंत्र ईश्वर प्रसन्न होता है! संसद के मंदिर के जो

पुजारी है! उन्होंने पूजा का और श्लोक को आधुनिकरण करते हुए संसद को घोर कलयुग में धकेल दिया है! अब यह मंदिर न

रहकर केवल मनोरंजन और पिकनिक का स्पॉट बन गया है ! यहां पर काम कम हंगामा ज्यादा होता है! संसद के सांसद जनता की

जवाबदेही से ज्यादा अपनी रील बनाने में लगे हैं ! देश को आगे ले जाने की विचारधारा को काटते हुए अपनी पार्टी के फायदे की

विचारधारा ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है! लोकतंत्र के चुनाव में संसद हो या विधानसभा हो अरबो रुपए चुनाव में लगता है उसके

बाद सांसदों और विधायक पर खर्च कितना होता है ? और जनता को इससे क्या मिलता है? अब तो सांसद और विधानसभा

को ठप करने और न चलने देने का चलचित्र शौक बन गया है | जो सांसद जितना बड़ा हंगामा उसको उतना बड़ा तोहफा,,,, की

स्कीम लॉन्च कर दी गई है!

इन सांसदों को अपनी जनता जहां से वह चुन कर आये है ,उनकी जरा सी फिक्र नहीं है !उन्हें केवल अपने वेतन और भत्ते से

ज्यादा कोई प्रेम नहीं रहा है ! जनता का केवल यही काम है अपने खून पसीने की कमाई उनके चुनाव में और उनके वेतन भत्ते में

देते रहो और यह टीवी पर आकर अपना चेहरा चमकाएंगे

केंद्रीय बजट 2026-27 के अनुसार भारतीय संसद को सुचारू रूप से चलने के लिए 1492 करोड़ का वार्षिक बजट आवंटित

किया गया है

1. देश की तिजोरी पर पड़ा भारी आर्थिक बोझ

संसद को चलाने का खर्च आम जनता के टैक्स से आता है, लेकिन जब सदन में कामकाज नहीं होता, तब भी

प्रशासनिक खर्च जारी रहता है. इस मानसून सत्र में वित्तीय बर्बादी के मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं:

 प्रति मिनट ₹2.5 लाख का नुकसान: संसदीय विश्लेषणों के अनुसार, संसद के दोनों सदनों को सुचारू रूप से

चलाने की लागत लगभग ₹2.5 लाख प्रति मिनट और ₹1.5 करोड़ प्रति घंटा आती है.

 करीब ₹175 करोड़ से अधिक की बर्बादी: इस सत्र में हंगामे के कारण कुल 7,023 मिनट (लगभग 117

घंटे) का बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ, जिससे करदाताओं के ₹175.6 करोड़ से ₹232 करोड़ बिना किसी

परिणाम के स्वाहा हो गए.

 बिना चर्चा के कानून पास होना: सत्र के दौरान पेश किए गए 12 विधेयकों में से 11 को बिना किसी

विधायी चर्चा या बहस के केवल ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. बिना गंभीर समीक्षा के कानून बनना

देश की नीतिगत व्यवस्था के लिए एक बड़ा नुकसान है.

2. गरीब और किसान वर्ग पर इसका सीधा प्रभाव

जब संसद ठप होती है, तो नीतियां और जनहित के मुद्दे भी ठहर जाते हैं। समाज का वह तबका जो पूरी

तरह सरकारी नीतियों और राहत पर निर्भर है, उसे इसका सबसे भारी खामियाजा भुगतना पड़ता है:

 कृषि संकट और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर चर्चा नहीं: इस मानसून सत्र के दौरान देश के कई हिस्सों

में बाढ़ और सूखे जैसी गंभीर स्थितियां बनी हुई हैं, जिससे फसलें बर्बाद हो रही हैं। इसके अलावा किसान

लंबे समय से कानूनी रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी और कर्ज माफी जैसे मुद्दों पर संसद में

ठोस बहस की उम्मीद कर रहे थे। सत्र न चलने से अन्नदाता की यह आवाज पूरी तरह दब गई।

 महंगाई और ग्रामीण रोजगार (मनरेगा) की अनदेखी: ग्रामीण इलाकों में गरीब परिवारों के लिए 'मनरेगा'

(MGNREGA) आजीविका का मुख्य साधन है। संसद में बजट आवंटन और जमीनी स्तर पर मनरेगा के

बकाये भुगतान को लेकर कोई चर्चा नहीं हो सकी।

 प्रश्नकाल और शून्यकाल का खत्म होना: इस पूरे सत्र में लोकसभा में प्रश्नकाल केवल 9 मिनट ही चल सका।

प्रश्नकाल और शून्यकाल ही वे माध्यम हैं जहाँ स्थानीय सांसद अपने क्षेत्र के गरीब किसानों की समस्याओं,

सिंचाई परियोजनाओं, खाद की किल्लत और ग्रामीण विकास योजनाओं के बारे में सरकार से सीधे जवाब

मांगते हैं। मंत्रियों के सवाल-जवाब से बचने के कारण ग्रामीण योजनाओं की जवाबदेही खत्म हो गई।

‘’संसद में विरोध दर्ज कराना विपक्ष का अधिकार है और सदन को सुचारू रूप से चलाना सरकार की

जिम्मेदारी। लेकिन जब दोनों पक्षों की जिद के कारण पूरा सत्र ही धुल जाता है, तो नुकसान किसी पार्टी का

नहीं बल्कि देश के आम नागरिक का होता है। ₹175 करोड़ से अधिक की यह राशि देश के ग्रामीण

अस्पतालों, स्कूलों या किसान राहत कोष में इस्तेमाल हो सकती थी。 देश के गरीब और किसान वर्ग को

आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि संसद में हंगामे के बजाय उनके हकों, उनकी समस्याओं

और उनके विकास की नीतियों पर सार्थक बहस की जाए।“”

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