मध्य प्रदेश में 20 साल में 80000 से अधिक एग्रीकल्चर स्टूडेंट हुए हैं!
इनमें से केवल एक प्रतिशत ने उद्योग लगाए होंगे !
Manish bafana- कृषि विज्ञान एक प्रोफेशनल डिग्री होने के बावजूद भी इसकी पढ़ाई करने वाले अधिकांश विद्यार्थी इसकोअन्य उद्योग के समान उद्योगपति बनना नहीं चाहतेजैसे कि अन्य डिग्री इंजीनियरिंग ,डॉक्टरी, चार्टर्ड अकाउंटेंट, वेटरनरी, फार्मासिस्ट ,आईटी प्रोफेशनल यह सभी पढ़ाई करने वालेविद्यार्थी इसी प्रोफेशनल में उद्योगपति बनते हैं |
भारत में कृषि क्षेत्र बहुत बड़ा क्षेत्र है l जहां पर कृषि दवाई ,उर्वरक और बीज का व्यापार 4लाख करोड़ से भी अधिक का होताहै!पर विडंबना आप देखिए, 5 वर्ष में 3 लाख स्टूडेंट कृषि आधारित पढ़ाई करते हैं परंतु उद्योग में यह केवल तीन से चार प्रतिशतही उद्योगपति है |कृषि से संबंधित उद्योगों में एग्रीकल्चर ग्रेजुएट की भागीदारी पांच प्रतिशत से भी कम है |पेस्टिसाइड निर्माण और बीज उत्पादन की बात करें तो इसमें एग्रीकल्चर स्टूडेंट की भूमिका केवल मैनेजर बनकर रह गई है! बीजव्यवसाय में अत्यधिक चुनौतियां हैं | उत्पादन से लेकर विपणन में भी सरकारी चुनौतियों के साथ-साथ राजनीति चुनौतियां केसाथ भारी इन्वेस्टमेंट ने एग्रीकल्चर स्टूडेंट को एग्रीकल्चर इनपुट सेल्स मैनेजर बना रखा है ! मध्य प्रदेश में 20 साल में 80000 से अधिक एग्रीकल्चर स्टूडेंट हुए हैं! इनमें से केवल एक प्रतिशत ने उद्योग लगाए होंगे! मध्य प्रदेश में केवल 20 कीटनाशक कंपनियां है!यहां पर भी केवल दो या तीन ऐसे एग्रीकल्चर स्टूडेंट होंगे जो कीटनाशक का निर्माण करते हैं !
पेस्टिसाइड निर्माण की प्रक्रिया इतनी जटिल और कठिनाई वाली है, बताते हैं कि इसका लाइसेंस प्राप्त करने में एड़ी चोटी लगजाती है ! रिवाल्वर का लाइसेंस और आबकारी लाइसेंस लेना सरल परंतु कीटनाशक निर्माण का लाइसेंस लेने की एक लंबीप्रक्रिया है ! लाइसेंस प्राप्त करने के बाद उत्पाद को बेचने में भी बड़ा जोखिम होता है ! और अब देश भर में कई राजनीतिक पार्टी किसान और मीडिया नकली दवाई ,नकली बीज, नकली खाद, का माहौल पैदा करते हैं | जिससे उत्पादन कर्ता हमेशा डरा घबरायारहता है ! कीटनाशक और बीज बहुत बड़ा उद्योग है, जिसमें एग्रीकल्चर स्टूडेंट की भागीदारी मुश्किल से 2% है ! विशेषज्ञों का मानना है कि, अत्यधिक पूंजी, कृषि अनिश्चित से बना है, कौनसा कीटनाशक कब चलेगा इसका अनुमान मुश्किलहै| बीज में भी यही हाल है ! बीज उत्पादन के पश्चात विपणन में बहुत कठिनाई है, वातावरण अनुकूल नहीं हो और बीज काअंकुरण नहीं हो तो बीज कंपनी का लाइसेंस निरस्त हो जाता है, करोड़ों रुपए डूब जाते हैं !और अभी वर्तमान दौर में राजनीति करने वाले किसान नेताओं ने बीज और कीटनाशक बनाने वाले पर भारी दबाव डाल रखा है!कई झूठी शिकायत होने पर लगातार इन कंपनियों को जांच से गुजरना पड़ता है! जाँच से राहत के लिए जेब से अतिरिक्त धन
खर्च करना पड़ता है ! सीजन प्रारंभ होते ही नकली खाद, नकली बीज, नकली दवाई का डिंडोरी पीटना शुरू हो जाता है! मध्य
प्रदेश में ही कीटनाशक कंपनियों का क्रम लगातार गिर रहा है! 20 से25 कंपनियों में से मात्र 5 से 10 कंपनी ही कार्यशील है!
वर्तमान के नवयुवक कृषि आधारित उद्योग लगाने से पीछे हट रहे हैं, खासकर पेस्टिसाइड और बीज निर्माण में – इसके बड़े कारण हैं:
. रेगुलेशन और लाइसेंस का झंझट – सबसे बड़ा कारण*
- पेस्टिसाइड: CIBRC लाइसेंस, फैक्ट्री लाइसेंस, पर्यावरण क्लीयरेंस, लेबल अप्रूवल। 1-2 साल लग जाते हैं । बिना लाइसेंस 1ग्राम भी नहीं बना सकते। सेल पेर्मिशन , सैंपल का री सैंपल करने कोर्ट जाना ,किसान ,राजनीति व विभाग हमेशा नकली
कीटनाशक से पहचान देता है।
बीज: NSC, राजकीय बीज प्रमाणन एजेंसी से अप्रूवल, ICAR की NOC, जर्मिनेशन टेस्ट। हर सीजन टेस्टिंग। - नवयुवक के पास इतना टाइम और पैसा फंसाने का रिस्क नहीं है।
. पूंजी + रिस्क बहुत ज्यादा*
- पेस्टिसाइड प्लांट: ₹2 करोड़ से शुरू। रॉ मटेरियल चाइना से आता है, दाम रोज बदलते हैं।
- बीज कंपनी: ब्रीडिंग, फाउंडेशन सीड, पैकेजिंग, कोल्ड स्टोर – 2 से 3 करोड़ का निवेश ।
और सबसे बड़ा रिस्क: खराब बैच आया तो पूरा ब्रांड डूब।
. मार्केट पर बड़ी कंपनियों का कब्जा* - पेस्टिसाइड: Bayer, Syngenta, UPL, PI Industries का डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क हर गांव तक है। वो 6 महीने का उधार
देते हैं। - बीज: Mahyco, Kaveri, Nuziveedu जैसी कंपनियां TV + डीलर को 30% मार्जिन देती हैं।
- नया ब्रांड आए तो डीलर जगह ही नहीं देता। किसान भी “पहचान वाला” ब्रांड मांगता है।
. जानकारी और टेक्निकल ज्ञान की कमी
कृषि यूनिवर्सिटी में पढ़ाते तो हैं, पर फॉर्मूलेशन, ब्रीडिंग, रजिस्ट्रेशन की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग नहीं मिलती।
पेस्टिसाइड में केमिस्ट्री चाहिए। बीज में जेनेटिक्स चाहिए। दोनों के लिए लैब और R&D चाहिए। ये कॉलेज में नहीं सिखाया
जाता।
. किसान का पेमेंट साइकिल
किसान 90% माल उधार लेता है और फसल बेचने के बाद पैसा देता है। यानी 6 महीने पैसा फंसा।
नई कंपनी के पास इतना वर्किंग कैपिटल नहीं होता। बैंक भी एग्री-बिजनेस को लोन देने से डरते हैं।
पेस्टिसाइड निर्माण में स्थिति
भारत में करीब कुल यूनिट 150 टेक्निकल ग्रेड निर्माता व 800 फॉर्मूलेटर है। जिसमे केवल 3% से कम यानी ४० यूनिट में ही ही कृषि स्नातकों द्वारा चल रही
बीज कंपनी में स्थिति*
500 कंपनियों में से 10% यानी 50 कंपनियां* कृषि स्नातकों/कृषि वैज्ञानिकों द्वारा शुरू की गई हैं। बाकी
ट्रेडर और बड़ी कॉर्पोरेट हैं।