भारत की कृषि संविदा कर्मचारी के भरोसे

–भारत का कृषि क्षेत्र वैज्ञानिकों की कमी से जूझ रहा है—– 

Manish bafana – भारत में कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की कमी से कृषि का क्षेत्र गड़बड़ होकर असंतुलन की ओर बढ़ रहा है ! यदि देश की खेती संविदा कर्मचारियों के भरोसे होगी तो खेती का विकास और किसानों की आय कैसे बढ़ेगी !

केंद्र सरकार ने बताया कि, पूरे भारत में भारतीय कृषि अनुसंधान क्षेत्र icar के अंतर्गत आने वाले कृषि वैज्ञानिक को की संख्या 4840 है !

भारत की कृषि रीड की हड्डी को संभालने वाले 19,739 संविदा कर्मचारी है ! जिन्हें समय पर भी वेतन मिल जाए तो बहुत बड़ी बात है।

यह संविदा कर्मचारी में  यंग प्रोफेशनल, अनुसंधान एसोसिएट, वरिष्ठ अनुसंधान फेलोशिप

जूनियर अनुसंधान फैलोशिप इस संविदा पद में  शामिल है! यह परिस्थितियों केंद्र सरकार के अधीन भारतीय कृषि अनुसंधान आईसीएआर का है! इसके अतिरिक्त कई राज्यों में उनके विश्वविद्यालय की भी स्थिति बहुत खराब है! वहां पर भी कृषि वैज्ञानिकों का वेतन निकलना मुश्किल हो रहा है!

ICAR – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ही देश का सबसे बड़ा कृषि शोध संगठन है। यहां 6000+ वैज्ञानिकों के पद स्वीकृत हैं। 

लेकिन 35% से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। यानी हर 3 में से 1 सीट खाली है।

कई KVK – कृषि विज्ञान केंद्र और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में तो 50% तक पद खाली हैं।

*क्यों हो रही है कमी ?*

1. *भर्ती धीमी*: ICAR में वैज्ञानिकों की भर्ती ARS एग्जाम से होती है। कोरोना के बाद 3-4 साल तक भर्ती नहीं हुई। अब बैकलॉग बहुत है

2. *पलायन*: अच्छे वैज्ञानिक सैलरी और रिसर्च फंड की कमी से प्राइवेट कंपनी, विदेश या कॉरपोरेट में चले जा रहे हैं

3. *बजट*: कृषि रिसर्च पर GDP का 0.5% से भी कम खर्च होता है। लैब, फील्ड ट्रायल के लिए पैसा नहीं

4. *युवाओं का रुझान कम*: खेती को “लो-प्रतिष्ठा” वाला पेशा मानकर नए PhD वाले इस फील्ड में नहीं आ रहे

  *असर क्या पड़ रहा है?*
**क्षेत्र*                                     * **असर**
**नई फसल किस्में*            * सूखा, गर्मी सहन करने वाली बीज 2-3 साल लेट आ रहे हैं
**कीट-बीमारी**             गेहूं का रतुआ, धान का ब्लास्ट जैसी बीमारियों पर रिसर्च धीमी
**किसान तक पहुंच**       KVK में वैज्ञानिक कम तो गांव-गांव तक नई तकनीक नहीं पहुंच रही
**जलवायु परिवर्तन**        क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर पर काम करने वाले एक्सपर्ट कम हैं छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी धान, मोटा अनाज और जैविक खेती पर रिसर्च के लिए स्पेशलिस्ट कम हैं।   *  

सरकार क्या कर रही है

1. *ICAR ARS भर्ती 2024-25*: 500+ पदों पर नई भर्ती निकाली गई है

2. *NABI, NAARM जैसी ट्रेनिंग*: युवा वैज्ञानिकों को स्किल देने के लिए

3. *PPP मॉडल*:          प्राइवेट कंपनी + ICAR मिलकर रिसर्च कर रहे हैं

4. सैलरी बढ़ोतरी*:        7वें वेतन आयोग के बाद वैज्ञानिकों की सैलरी सुधरी है

*एक्सपर्ट क्या कहते हैं?*

कृषि अर्थशास्त्रियों का कहना है: “भारत को 2047 तक खाद्य सुरक्षा चाहिए तो हर साल 1000 नए कृषि वैज्ञानिक चाहिए। वरना हम क्लाइमेट चेंज और घटती जमीन से नहीं लड़ पाएंगे”

*आगे का रास्ता*

1. *भर्ती प्रक्रिया तेज* करना

2. *रिसर्च फंड* दोगुना करना

3. *गांव में काम* करने वाले वैज्ञानिकों को स्पेशल इंसेंटिव

4. *स्कूल-कॉलेज में* कृषि को करियर ऑप्शन बनाना

भारत दुनिया का सबसे बड़ा कृषि उत्पादक है, पर अगर वैज्ञानिकों की कमी ऐसे ही रही तो “लैब से खेत तक” की दूरी बढ़ती जाएगी।

MP  “कृषि प्रधान राज्य” कहा जाता है, पर यहां कृषि तंत्र ही स्टाफ की कमी से चरमरा गया है।

सरकार “कृषक कल्याण वर्ष” मना रही है, पर बिना वैज्ञानिकों के ये लक्ष्य जमीन पर उतरना मुश्किल है

. आंकड़े क्या कहते हैं

. कृषि विभाग में भारी खाली पद

– *कुल स्वीकृत पद*: 14,537

– *भरे हुए*: सिर्फ 6,126

– *खाली*: 8,468 पद = *60% कमी*

– *वरिष्ठ अधिकारी*: 182 में से 113 पद खाली = 62% कमी

– *ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी*: मैदानी स्तर के 60% पद खाली

. कृषि विश्वविद्यालय और KVK की हालत*

mp   के कृषि  विश्वविध्यलय  JNKVV जबलपुर , RVSKVV ग्वालियर के अंतर्गत 44 कृषि विज्ञान केंद्र है। इन केंद्रों में *लगभग 10,000 वैज्ञानिक और स्टाफ* काम करते हैं। यह  संस्था   पैसे  की  कमी से जूझ  रही है। बताया  जाता  है की ,6 महीने से वेतन नहीं मिला जिसके कारण पिछले 6 महीने में 12 बार हड़ताल हो चुकी है।  ICAR ने 2023 से इन विश्वविद्यालयों का खर्च उठाने से मना कर दिया है।

**विभाग**                      **खाली पद**
**उद्यानिकी**                3079 में से 1459 पद = 47% खाली *
*मत्स्य पालन**            1290 में से 722 पद खाली *
*पशुपालन**                7992 में से 1797 पद = 22% खाली  

. कमी का असर क्या पड़ रहा है?*

1. 60 लाख किसान बिना सलाह*: जो किसान सीधे वैज्ञानिकों से फसल, मौसम, कीट नियंत्रण की सलाह लेते थे वो अब बिना मार्गदर्शन खेती कर रहे

2. नई तकनीक नहीं पहुंच रही*: नई किस्म के बीज, उन्नत खाद और आधुनिक तकनीकों की जानकारी किसानों तक नहीं पहुंच पा रही

3. सॉयल लैब बंद*: 313 ब्लॉकों में 150 करोड़ की 263 मिट्टी परीक्षण लैब में स्टाफ न होने से मशीनों पर धूल जमी है

4. ड्रोन दीदी योजना फेल*: तकनीकी और मानवीय सहयोग के अभाव में ये योजना बैट्री पर निर्भर होकर रह गई

5. किसानों की उपज और कीट बचाव प्रभावित*: पैदावार पर असर पड़ रहा है

. 6 कृषक कल्याण वर्ष 2026′ घोषित*: पर विभाग खुद 60% स्टाफ की कमी से जूझ रहा

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