नहीं संभाला वायु और जल ,तो भविष्य जल जायेगा कल जलवायु परिवर्तन से देश के 310 जिले पर सूखे व बाढ़ जोखिम मंडरा रहा है

मनीष बाफना -जलवायु परिवर्तन में अल नीनो (El Niño) के कारण वैश्विक स्तर पर तापमान बढ़ता है, मानसूनी हवाएं
कमजोर होती हैं और दुनिया भर के मौसम में भारी उथल-पुथल मचती है, कृषि क्षेत्र पर प्रभाव देखने को मिल रहा है ! जलवायु
परिवर्तन से आने वाले समय में कृषि पर बहुत ही गहरा आघात लगने वाला है ! जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा भारत का
कृषि क्षेत्र प्रभावित होगा !
नेशनल इनोवेशन इन क्लाइमेट रेसिलियंट एग्रीकल्चर ( निक्रा ) परियोजना के अंतर्गत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन
किया गया !वैज्ञानिकों ने बताया कि भारत में मुख्य रूप से खेती पर निर्भर 651 जिलों में जलवायु परिवर्तन से कृषि को होने
वाले जोखिम का आकलन किया गया
आकलन के आधार पर 310 जिलों की पहचान संवेदनशील जिलों के तौर पर की गई।
इनमें से 109 जिलों में बहुत अधिक और 201 जिलों को अत्यधिक के अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है !
देश भर के 201 जिले में जलवायु परिवर्तन से धान ,ज्वार, मक्का एवं गेहूं की फसल प्रभावित होगी !
1- देश के 201 जिले अत्यधिक के अधिक संवेदनशील रेड जोन में
2- कई फसलों में उसके उत्पादन में 50% तक की कमी हो सकती है।
3 -धान, अनाज औषधि फसलों के बीज विलुप्त या संकटग्रस्त होंगे
4 -तापमान के बढ़ने के कारण फसलों के कुछ अनुवांशिक जीन प्रभावित होंगे
5 -कर्नाटक राज्य के 16 जिले अत्यधिक सूखे से प्रभावित है

कहीं अधिक बारिश की वजह से बाढ़ के हालात से फसल खराब हो रही है तो कई क्षेत्रों में कम ठंड की वजह से अत्यधिक गर्मी
आने के कारण गेहूं की फसल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है !

जलवायु परिवर्तन से भारत के कुछ राज्य बिहार, हिमाचल प्रदेश ,केरल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के कई जिले इसकी आगोश में
सिमट गए हैं।
मध्य प्रदेश के दो जिले भिंड और झाबुआ अत्यधिक सूखा क्षेत्र में शामिल कर लिए गए हैं।
केरल में कुछ जिलो को अत्यधिक बाढ़ में शामिल किया गया है। कर्नाटक राज्य के 16 जिले अत्यधिक सुख से प्रभावित है!
क्लाइमेटिक परिवर्तन के कारण 1 लाख से अधिक धान, अनाज औषधि फसलों के बीज विलुप्त या संकटग्रस्त हो सकते हैं।
भविष्य में भी जलवायु परिवर्तन से कई फसलों में उसके उत्पादन में 50% तक की कमी हो सकती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सिमुलेशन मॉडलिंग अध्ययन में बताया गया
यदि अभी रहते हुए यदि इसकी चिंता नहीं की गई तो 2050 में चावल की उपज में 20% और 2080 में 47% तक उत्पादन में
कमी की संभावना अध्ययन में बताई है , जो ख़बरदार के साथ चौकन्ना भी करती है।
गेहूं के उत्पादन में भी 2050 में 20% और 2080 में 40% तक कम होने की संभावना देखी गई है

2050 तक कई फसलों में उत्पादन 20% तक घट जाएगा वही वर्षा का भी स्वरूप चेंज होकर वह बाढ़ के रूप में दिखेगा।
जिससे प्रतिवर्ष प्रति हेक्ट 10 टन उपजाऊ मिट्टी बाढ़ में बहेगी या सूखे में गर्मी से क्षारीय में बदलेगी और नुकसान होगा

जब उपजाऊ मिट्टी ही खत्म होती जाएगी तो फसले कैसे तैयार होगी ? उसी प्रकार मिट्टी में लवण/ क्षारीय की मात्रा भी बढ़ती
जाएगी तो मिट्टी की उपजाऊ शीलता भी समाप्त होती जाएगी।
चक्रवात के कारण गुजरात में वर्ष 2023 में 113358 हेक्टर फसलों को नुकसान उठाना पड़ा !
अध्ययन में यह भी पता चला कि कार्बन डाइऑक्साइड और तापमान के बढ़ने के कारण मक्का के कुछ अनुवांशिक जीन प्रभावित
हुए जिससे आयरन जिंक और प्रोटीन की मात्रा मक्के में कम हो गई है !
चावल में उच्च कार्बन डाइऑक्साइड ने अनाज की गुणवत्ता एम आईलोक और प्रोटीन के अंश को प्रभावित किया है !
तापमान बढ़ने से गेहूं के दाने सिकुड़ गए हैं उनमें स्टार्च और प्रोटीन का अंश कम हो गया है जिससे उपज अब कम हो रही है !
*जलवायु परिवर्तन का कृषि पर असर और केंद्र सरकार क्या कर रही है*

केंद्र सरकार के बड़े कदम / योजनाएं*
बीज और तकनीक*
1-भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने क्लाइमेट चेंज के कारण 2014 से 2024 के बीच में 2900 फसलों की किस्म पर
अनुसंधान किया और उसको जारी किया इसमें से अनाज की 1258 तिलहन की 368 और दलहन की 410 किस्में में शामिल
है !
.
2. प्राकृतिक खेती / जैविक खेती*: रसायन कम, मिट्टी में कार्बन बढ़े। PM-PRANAM योजना से रासायनिक खाद कम करने
पर प्रोत्साहन

*E. कार्बन क्रेडिट और नई पहल*
1. *कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम*: किसान धान में "वैकल्पिक गीला-सूखा" AWD तकनीक अपनाए तो कार्बन क्रेडिट बेचकर
पैसा कमाएगा
2. *सौर ऊर्जा*: PM-KUSUM योजना से सोलर पंप। बिजली का खर्च और डीजल दोनों बचे

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