दुग्ध सहकारी समितियों (Milk Cooperatives) और प्राइवेट डेयरियों का एक ऐसा कड़वा सच है, आज बड़ी-बड़ी डेयरियां और कॉपरेटिव्स हर साल करोड़ों लीटर दूध का संग्रह (Milk Procurement) कर रहे हैं, अरबों का टर्नओवर बना रहे हैं, लेकिन जो किसान सुबह 4 बजे उठकर गोबर साफ करता है और चारे का इंतजाम करता है, उसके हाथ में ‘कुछ नहीं’ आ रहा है।
दूध के लिए भी एक न्यूनतम खरीद मूल्य (Floor Price) तय होना अनिवार्य
Manish bafana
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश होने का गौरव तो रखता है, लेकिन इस ‘श्वेत क्रांति’ की नींव रखने वाला किसान खुद अंधेरे में है。 देश के ग्रामीण इलाकों से आ रही खबरें बताती हैं कि पशुपालक और दुग्ध उत्पादक किसानों को उनके दूध का उचित मूल्य न मिलना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संकट बन गया है。 एक तरफ जहां शहरों में पैकेट वाले दूध की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर असली मेहनत करने वाले किसानों को उनकी लागत निकालना भी भारी पड़ रहा है。
लागत में 30% से 40% की भारी बढ़ोतरी, मुनाफा शून्य
हालिया मीडिया रिपोर्टों और किसान संगठनों के अनुसार, पशुओं को खिलाए जाने वाले चारे और दाने की कीमतों में भारी उछाल आया है。
- पशु आहार हुआ महंगा: कपासिया खली, चोकर, बिनौला और सूखे भूसे के दाम पिछले कुछ समय में 30% से 40% तक बढ़ चुके हैं。
- दैनिक खर्च का गणित: जानकारों के मुताबिक, एक दुधारू पशु (गाय या भैंस) के रखरखाव, दवाइयों और चारे पर रोज का औसतन खर्च ₹300 से ₹350 आता है。
- किसान को क्या मिलता है?: यदि पशु दिनभर में 10 लीटर दूध देता है और निजी कॉपरेटिव या बिचौलिए किसान से उसे मात्र ₹35 से ₹42 प्रति लीटर की दर से खरीदते हैं, तो किसान की जेब में सिर्फ लागत का पैसा ही वापस आता है。 उसकी अपनी दिन-रात की शारीरिक मेहनत की कीमत शून्य रह जाती है।
हालिया विवाद: इंदौर में दूध के दामों पर आमने-सामने किसान और विक्रेता संघ
दूध की कम कीमतों का यह मुद्दा हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर में खुलकर सामने आया है。 1 अक्टूबर से वहां दूध के दामों में ₹2 से ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है, जिससे खुदरा दुकानों पर खुला दूध ₹68 प्रति लीटर तक पहुंच गया है。
लेकिन इस बढ़ोतरी के बावजूद मध्यप्रदेश दूध किसान संघ ने गहरी नाराजगी जताई है। किसान संगठनों का कहना है कि लागत इतनी बढ़ चुकी है कि किसानों को कम से कम ₹70 प्रति लीटर का खरीद मूल्य (Procurement Price) मिलना ही चाहिए। किसान नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें उचित दाम नहीं मिला, तो वे शहरों में दूध की सप्लाई रोकने पर भी विचार कर सकते हैं。
कम दाम मिलने के 3 मुख्य कारण (ग्राउंड रिपोर्ट)
- बिचौलियों का मायाजाल: गांवों में मजबूत और पारदर्शी सरकारी सहकारी समितियों की कमी का फायदा उठाकर निजी डेयरियां और बिचौलिए किसानों का शोषण करते हैं।
- फैट (Fat) जांच के नाम पर कटौती: दूध का मूल्य निर्धारण पूरी तरह से फैट और SNF की मात्रा पर निर्भर होता है। जरा सी गिरावट होने पर कंपनियां दूध का रेट बहुत ज्यादा घटा देती हैं。
- भंडारण (Cold Storage) की लाचारी: दूध जल्दी खराब होने वाली वस्तु है। कोल्ड स्टोरेज न होने के कारण किसान मोलभाव करने की स्थिति में नहीं होता और उसे नुकसान उठाकर भी दूध बेचना पड़ता है।
विशेषज्ञों की राय: पशुपालकों के लिए भी हो MSP की व्यवस्था
कृषि और डेयरी क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह 23 फसलों के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करती है, उसी तरह दूध के लिए भी एक न्यूनतम खरीद मूल्य (Floor Price) तय होना अनिवार्य है। इसके साथ ही, किसानों को छोटे-छोटे समूहों (FPOs) में संगठित होकर खुद घी, पनीर और खोया जैसे मूल्य संवर्धित (Value-Added) उत्पाद बनाकर सीधे बाजार में बेचने होंगे, ताकि वे बिचौलियों के जाल से मुक्त हो सकें。
‘दूध का समंदर‘ बटोर रही हैं कॉपरेटिव डेयरियां, प्राइवेट डेयरी, पर अन्नदाता की झोली आज भी खाली
देश में दुग्ध क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें और होर्डिंग्स चमचमा रहे हैं। कंपनियां गर्व से विज्ञापन देती हैं कि वे रोजाना लाखों-करोड़ों लीटर दूध का संग्रह (Milk Collection) कर रही हैं। लेकिन इस चमकते हुए टर्नओवर के पीछे का स्याह सच यह है कि दूध का संग्रह तो रिकॉर्ड तोड़ हो रहा है, मगर जमीनी किसान को कुछ नहीं मिल रहा है। उपभोक्ता शहरों में जिस दूध के पैकेट के लिए ₹66 से ₹74 प्रति लीटर चुका रहा है, वही दूध गांवों में किसान से मात्र ₹32 से ₹40 प्रति लीटर में समेटा जा रहा है।
संग्रह का रिकॉर्ड, मुनाफे का खेल
आज देश के हर कोने में दूध कलेक्शन सेंटर खुले हुए हैं। सुबह और शाम किसानों की लंबी कतारें लगती हैं। डेयरियों के बड़े-बड़े टैंकर गांवों से दूध खींचकर शहरों के प्रोसेसिंग प्लांट्स में ले जाते हैं। वहां इस दूध से महंगे घी, चीज (Cheese), बटर, पनीर और पैकेट बंद छाछ बनाए जाते हैं, जो ऊंचे दामों पर बिकते हैं।
सवाल यह उठता है कि जब इस ‘सफेद सोने’ से डेयरियों और कंपनियों की तिजोरियां भर रही हैं, तो दूध पैदा करने वाले किसान के बच्चों को फटेहाल जिंदगी क्यों जीनी पड़ रही है?
सांची दुग्ध संघों, का टर्नओवर
टर्नओवर (कुल कारोबार) कितना है?
- सालाना टर्नओवर: रिपोर्ट्स के अनुसार, सांची (MPCDF) का कुल सालाना टर्नओवर ₹1,982 करोड़ (लगभग ₹2,000 करोड़) दर्ज किया गया था। [1]
- इंदौर दुग्ध संघ की हिस्सेदारी: सांची के कुल 6 क्षेत्रीय संघों में से अकेले Indore Sahakari Dugdh Sangh का सालाना रेवेन्यू (TOI) ₹648 करोड़ से अधिक है। [
भारत में प्राइवेट डेयरी कंपनियां हजारों करोड़ रुपये का कारोबार (Turnover) कर रही हैं। जहां कॉपरेटिव डेयरियां (जैसे अमूल, सांची) देश में बड़ी हिस्सेदारी रखती हैं, वहीं लिस्टेड और अनलिस्टेड प्राइवेट डेयरी कंपनियां Screener Dairy Companies हर साल भारी-भरकम मुनाफा और रेवेन्यू कमा रही हैं।

2. बिना लिस्टेड (Unlisted) बड़ी प्राइवेट डेयरियां
शेयर बाजार के बाहर भी कुछ ऐसी प्राइवेट डेयरियां हैं जो कॉपरेटिव्स से मुकाबला कर रही हैं:
- इंदापुर डेयरी (Sonai Doodh): पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र) की इस बड़ी प्राइवेट कंपनी का सालाना रेवेन्यू ₹4,400 करोड़ से ज्यादा है।
- VRS Foods (Paras Dairy): उत्तर भारत का एक जाना-माना प्राइवेट ब्रांड है, जिसका सालाना कारोबार लगभग ₹2,800 करोड़ तक पहुंच चुका है।
- तिरुमला मिल्क प्रोडक्ट्स (Tirumala Milk): दक्षिण भारत में मजबूत नेटवर्क रखने वाली इस प्राइवेट डेयरी का सालाना टर्नओवर ₹2,692 करोड़ दर्ज किया गया था।