E टोकन – किसानो को खाद देने में क्यों ठोकता व टोकता
है ??

E टोकन खाद प्रणाली से किसान है परेशान–
ONE नेशन ONE रॉशन योजना में कोई भी गरीब ५ किलो राशन
भारत में कही से भी ले सकता है पर किसान उर्वरक नहीं –
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Manish bafana –
सरकार द्वारा खाद की कालाबाजारी रोकने और लंबी कतारों से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से शुरू की गई ऑनलाइन ई-टोकन
प्रणाली वर्तमान में किसानों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। पोर्टल की तकनीकी कमियों, सर्वर डाउन रहने और अव्यावहारिक
नियमों के कारण किसानों को समय पर यूरिया और डीएपी (DAP) नहीं मिल पा रहा है, जिससे खरीफ और रबी सीजन की
बुवाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
मध्य प्रदेश में वैसे भी बारिश कम हुई है, कई जिले के किसान जल के अभाव में भी खेती कर रहे हैं ! जलवायु परिवर्तन से
परेशान किसान अब शासन की अव्यवस्था से भी परेशान है ! बिजली का संकट, पानी का संकट अब सरकार ने E टोकन से खाद
की प्रणाली से भी कई किसान परेशान हो रहे हैं !
सबसे ज्यादा वह किसान परेशान हो रहे हैं, जो सोसाइटी से नहीं जुड़े हैं या अपात्र है जो निजी विक्रेताओं से खाद लेना चाह रहे
हैं, उनके सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है !
E टोकन प्रणाली में फार्मर आईडी जरूरी है परंतु कई किसानों जिनकी जमीन अलग-अलग जिलों में है उनके नाम में भी कुछ
थोड़ा सा भी फर्क है , जैसे राजेश कुमार एक जगह है दूसरी जगह केवल राजेश है, वह भी उर्वरक लेने से वंचित हो रहे हैं !
टोकन बुकिंग में भी किसानों को ओटीपी समय पर नहीं आ रहे हैं ! 2से 3 से बार ओटीपी लेना पड़ रहे हैं | टोकन जारी के समय
कई विक्रेता के नाम भी नहीं दिख रहे हैं ! यहां तक बताया जा रहा है, कि कुछ गिने-चुने चहते और राजनीतिक पहुंच वाले
विक्रेता के ही नाम ही विक्रेता के रूप में दिख रहे हैं ! यह तो कुछ नहीं है ,बुकिंग के बाद फर्टिलाइजर विक्रेताओं की दुकान
किसानों को अपने गांव से 50 किलोमीटर की दूरी पर भी आवंटित हो रही है !
इस प्रणाली में कई ऐसे विक्रेता जो खाद और फर्टिलाइजर का काम नहीं करते हैं केवल पेस्टिसाइड बेच रहे हैं उनके भी नाम से
भी टोकन जारी हो रहे हैं ! किसानों का समय,डीजल ट्रैक्टर का भाड़ा सब नष्ट हो रहा है !
कई किसान अपनी उपज दूसरे अन्य जिले की मंडी में बेचते हैं ! और वह चाहे कि अब यहां से उर्वरक खरीद लूं परंतु Eटोकन
प्रणाली उसको ऐसा करने से रोकती है,। किसान जिस जिले से है, उसे उस जिले से उर्वरक लेना होगा ! चाहे उसको उर्वरक
मनपसंद का नहीं मिले फिर भी उसको उसके जिले से लेना होगा ! जबकि ONE नेशन ONE रॉशन योजना में कोई भी
गरीब ५ किलो राशन भारत में कही से भी ले सकता है पर किसान उर्वरक नहीं | बात यहीं खत्म नहीं हो रही है, कुछ
किसान ऐसे होते हैं जिनको तुरंत एक दो बोरी खरीदना हो तो उसको वापस टोकन प्रणाली में जाना होगा। टोकन जनरेट कर
दो बोरी लेने के लिए उसको फिर 40 किलोमीटर दूर खाद खरीदने जाना होगा ! E टोकन प्रणाली में टोकन जनरेट करने के पहले
उर्वरक विक्रेताओं के स्पष्ट पता भी नहीं दिख रहे हैं, न हीं मोबाइल नंबर दिख रहे हैं !
कई उर्वरक विक्रेताओं के मोबाइल नंबर यदि आते हैं तो वह भी अधिकांश स्विच ऑफ रहते हैं ! जिससे विक्रेताओं का पता या
एड्रेस पता करना मुश्किल होता है !
कई उर्वरक विक्रेताओं के यहां यूरिया भंडार में दिख रहा है परंतु टोकन प्रणाली में उसका नाम नहीं दिख रहा है ! सरकार जनता
के लिए सुव्यवस्थाएं ,सरलीकरण इजी फॉर डूइंग के लिए कार्य करती है परंतु भारत का कृषि मंत्रालय किसानों को परेशान
करने की नियत और नीति पर क्यों चल रहा है ? कई बटाईदार किसान या जिन्होंने लीज पर जमीन ली है उनके लिए तो यह
प्रणाली घातक बन गई है ,उनको उर्वरक प्राप्त नहीं हो रहा है ! कई किसानों के राजस्व रिकॉर्ड में थोड़ी सी भी नाम में त्रुटि है तो
उनको भी उर्वरक से वंचित किया जा रहा है ! पहले केवल किसानों के आधार कार्ड के आधार पर उर्वरक मिल जाता था परंतु
फार्मर आईडी और टोकन दोनों ने मिलकर बड़ा संकट खड़ा कर रखा है!

किसानों की नाराजगी के पीछे बड़ी कमियां हैं———–
तकनीकी सुस्ती और सर्वर डाउन होना: बुकिंग शुरू होते ही कृषक ई-टोकन पोर्टल का सर्वर ठप हो जाता
है। साइट केवल 5 से 10 मिनट के लिए चलती है और फिर कूपन लिमिट खत्म या सर्वर एरर दिखाने लगती
है।
डिजिटल साक्षरता और स्मार्टफोन का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 50% किसानों के पास या तो
एंड्रॉइड स्मार्टफोन नहीं हैं या वे ऑनलाइन प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान हैं। उन्हें ई-टोकन के लिए
ऑनलाइन सेंटरों (MP Online/CSC) के चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे उनका पैसा और समय दोनों बर्बाद
होता है।
दूरी और गलत केंद्रों का आवंटन: सिस्टम में सबसे बड़ी खामी यह है कि किसानों को उनके नजदीकी
वितरण केंद्र के बजाय 50 से 100 किलोमीटर दूर के गोदाम आवंटित कर दिए जाते हैं। कई बार तो पड़ोसी
जिले के केंद्र अलॉट हो जाते हैं, जिससे खाद की कीमत से ज्यादा किसानों का भाड़ा (किराया) लग जाता है।

रकबा और भूमि रिकॉर्ड की त्रुटियां: एग्री-स्टैक (AgriStack) से लिंक होने के कारण यदि किसी किसान के
भूमि रिकॉर्ड (खसरा/खतौनी) में नाम की स्पेलिंग या आधार कार्ड में कोई मामूली अंतर है, तो उसकी फार्मर
आईडी ब्लॉक हो जाती है। इसके अलावा, वास्तविक जोत (जमीन) से कम रकबा पोर्टल पर दर्ज होने के
कारण किसानों को जरूरत से बहुत कम खाद आवंटित हो रही है।
सीमित वैधता जारी किए गए ई-टोकन की वैधता केवल 3 दिन (72 घंटे) की होती है। यदि किसान
निर्धारित समय में दूर-दराज के केंद्र पर नहीं पहुंच पाता, तो टोकन स्वतः निरस्त हो जाता है और उसे
दोबारा लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
मांग और उपलब्धता का बेमेल पोर्टल पर किसानों को उनकी पसंद की कंपनी या विशिष्ट उर्वरक (जैसे
डीएपी) चुनने की आजादी नहीं मिल पा रही है। कई बार जरूरत डीएपी की होती है, लेकिन सिस्टम उन्हें
यूरिया थमा देता है।
किसानों पर पड़ रहा प्रतिकूल प्रभाव
समय की बर्बादी: बुवाई के पीक सीजन में जब किसान को खेत में होना चाहिए, तब वह मोबाइल स्क्रीन के
सामने या सरकारी केंद्रों की कतारों में दिन-रात धूप में खड़ा रहता है।
लागत में वृद्धि: ऑनलाइन टोकन के लिए अतिरिक्त शुल्क और दूर के केंद्रों से खाद परिवहन के कारण खेती
की लागत लगातार बढ़ रही है।
फसल का नुकसान: समय पर खाद न मिलने के कारण फसलों की बुवाई पिछड़ रही है, जिसका सीधा असर
देश के खाद्य उत्पादन और किसान की आजीविका पर पड़ेगा।
मध्य प्रदेश का ‘गेहूं बेल्ट’ इस व्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ
है। इनमें शामिल हैं:

 नर्मदा घाटी और मध्य क्षेत्र: नर्मदापुरम (होशंगाबाद) – जो गेहूं उत्पादन में शीर्ष पर है, इसके अलावा
हरदा, नरसिंहपुर, सीहोर, रायसेन, विदिशा, और सागर)
 मालवा और चंबल क्षेत्र: उज्जैन, देवास, इंदौर, रतलाम, धार, गुना, ग्वालियर, और शिवपुरी
 कितने किसान प्रभावित हैं?
गेहूं की बुवाई के लिए डीएपी (DAP) और यूरिया की सबसे ज्यादा और तत्काल जरूरत होती है। इस वजह
से प्रदेश के लगभग 50 से 60 लाख केवल गेहूं उत्पादक किसान
इस नियम के चलते सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे थे, क्योंकि बुवाई के पीक समय पर सर्वर डाउन होने से
वे टोकन नहीं ले पा रहे थे ।

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